आप सभी को पंचायत दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें !
आज देश पंचायत राज के 28 साल मना रहा है I लेकिन पंचायती राज का 28वां वर्ष देश भर की पंचायतों के लिए एक नई चुनौती दे रहा है, और यह चुनौती COVID 19 के रूप में पंचायती राज संस्थाओं को आज वास्तव में स्थानीय सरकार होने का एहसास दिला रही है I देश भर की पंचायतें अपने अपने स्तर और राज्य सरकारों के आदेशों के अनुरूप इस माहमारी से लड़ने का प्रयास कर रही हैं I हाल में ही ओडिशा सरकार द्वारा प्रदेश के पंचायत सरपंचों को जिलाधीश के अधिकार दिए गए I इस खबर की सर्वत्र चर्चा है I यदि थोड़ा गहराई में जाएँ तो पाएंगे की यह अधिकार Disaster Management Act, 2005 और Epidemic Diseases Act 1897 के अंतर्गत दिए गए हैं I इन अधिकारों के अनुरूप अब पंचायतें और नगर निकाय बाहर से आने वाले लोगो का रेजिस्ट्रशन, क्वारंटाइन सहायता, मॉनिटरिंग तथा क्वारंटाइन समाप्त के पश्चात् 2000 रू की सहायता देने में सक्षम होंगी I इसी प्रकार देश के अन्य राज्यों में भी पंचायतें अपने स्तर पर इस स्थिति से निपटने का काम कर रही हैं, जिसमें पंचायतों अथवा गांवों में पूर्ण रूप से lockdown का पालन करवाना, क्वारंटाइन सुविधा, मास्क का उत्पादन एवं वितरण, साबुन, sanitiser, और अन्य राहत सामग्री का प्रबंधन एवं वितरण, पंचायत प्रतिनिधियों और फ्रंट लाइन वर्कर्स (ASHA, ANM, आंगनबाड़ी कार्यकर्त्ता) द्वारा जन जागरूकता अभियान आदि I इन सभी कार्यों में स्थानीय सामाजिक संगठन भी पंचायतों के साथ काम रहे हैं I
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है की पंचायत राज संस्थायें आपदा नियोजन और प्रबंधन को लेकर क्या वास्तव में सजग हैं और इसके लिए निरंतर प्रयासरत हैं या यह केवल वर्तमान स्थिति में एक प्रकार की त्वरित प्रतिक्रिया है ? यदि हम Disaster Management Act, 2005 को देखें तो इसमें पंचायती राज संस्थाओं की कोई भूमिका नहीं है, इसीलिए ओडिशा सरकार को अपने आदेश में Epidemic Diseases Act 1897 के सेक्शन 2 का सहारा लेना पड़ा I आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के सेक्शन 40 के अनुसार राज्य के प्रत्येक विभाग को राज्य आपदा प्राधिकरण के दिशा निर्देशों के अनुसार अपनी आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण करना है और सेक्शन 40 (2) के अनुसार आपदा प्रबंधन योजना तैयार करते समय प्रत्येक विभाग प्रस्तावित गतिविधियों के लिए वित्तपोषण का प्रावधान करेगा I वर्ष 2014 के वित्त मंत्रालय, भारत सरकार के दिशा निर्देश में यह कहा गया था की केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अंतर्गत 10 प्रतिशत फ्लेक्सी फण्ड का उपयोग आपदा के लिए किया जा सकता है I
संविधान की ग्याहरवीं अनुसूची जिसके अनुसार पंचायतों को 29 विषयों पर अधिकार दिए गए हैं इसमें भी "आपदा प्रबंधन" को शामिल नहीं किया गया है I हालाँकि जो विषय पंचायतों के अधीन हैं उनके द्वारा भी आपदा नियोजन और प्रबंधन को लेकर कार्य किया जा सकता है बशर्ते पंचायतें आपदा के चश्मे से इन विषयों को देख पायें I पंचायतों को संविधान द्वारा अपनी योजना बनाने अधिकार दिया गया है और वर्तमान में GPDP (ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान) के माध्यम से पंचायतें अपनी योजनाऐं भी बना रही हैं।
GPDP गाइडलाइन्स में यह उल्लेख किया गया है की ग्राम पंचायत सामाजिक गतिशीलता प्रक्रिया के उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सकता है और आपदा को काम करने के प्रयासों में आधुनिक तरीकों के पूरक के रूप में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का दोहन कर सकता है। इसके अनुसार समुदायों को अपनी अल्पकालिक और दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन योजना बनाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए जिसके लिए ग्राम पंचायत को समुदाय के क्षमता निर्माण में नेतृत्व प्रदान करने की आवश्यकता है। तथा ग्राम पंचायतों को आपदा तैयारी योजना को GPDP के साथ एकीकरण के बारे में विचार करना चाहिए। किन्तु यदि हम पिछले तीन वर्ष 2018 -19, 2019 -20 और 2020-21 के GPDP में योजना वार बजट आबंटन को देखें तो आपदा राहत कोष से आबंटन शून्य है I इसका सीधा अर्थ है की जब पंचायतों द्वारा ग्राम पंचायत विकास योजना का निर्माण किया जाता है तो इस मद में किसी भी प्रकार की योजनाओं को शामिल नहीं किया जाता I अर्थात पंचायतें आपदा प्रबंधन योजनाओं के प्रति जागरूक नहीं हैं अथवा इन योजनाओं के लिए अन्य मदों जैसे 14 वें वित्त आयोग अथवा राज्य वित्त आयोग की राशि का ही उपयोग किया जाता है I उदाहरण के लिए वर्तमान COVID19 की स्थिति में भी विभिन्न राज्य सरकारें और केंद्र सरकार द्वारा वित्त आयोग से ही मदद के लिए कुछ वित्तीय संसाधन उपलब्ध करवाए जा रहे हैं I एक दूसरा पहलू जो पंचायतों को आपदा प्रबंधन योजना को अधिक महत्व नहीं देने की ओर इशारा करता है, वह इस सन्दर्भ में पंचायतों की क्षमता का प्रश्न है ? यदि राज्यवार स्थिति को देखा जाये तो राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के द्वारा आपदा प्रबंधन में पंचायतों को एक मुख्य हितभागी के रूप में नहीं जोड़ा गया है I पंचायत राज प्रशिक्षण में भी आपदा प्रबंधन को एक क्रॉस कटिंग विषय में नहीं देखा जाता और यह केवल बाढ़, भूकंप जैसे विषयों तक ही सीमित है जिस कारण इसे अधिकतर भौगोलिक संदर्भ के साथ ही देखा जाता है I राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा वर्ष 2008 में ही जैविक आपदा प्रबंधन के विस्तृत दिशा निर्देश जारी किये गए थे लेकिन पंचायत राज प्रशिक्ष्ण के लिए इन और अन्य प्रकार की आपदाओं से सम्बंधित दिशा निर्देशों को कितना महत्व दिया गया है यह भी चर्चा का विषय है I
यदि हमें अपनी पंचायतों को भविष्य के लिए तैयार करना है तो सबसे अधिक जोर हमें पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण पर देना होगा I आवश्यकता इस बात की है की पंचायतों को अपनी योजनाओं को विषय मूलक न होकर कमज़ोर तबके, जेंडर,आपदा आदि की आवश्यकताओं से जोड़ कर देखना होगा I हमें यह नहीं भूलना चाहिए की कोई भी योजना भविष्य को ध्यान में रखकर बनायी जाती है लेकिन यदि भविष्य यदि अनिश्चित हो तो उस योजना का और अधिक महत्त्व होता है I
A tribute to Comrade Damodar Thankappan, reflecting on over four decades of friendship, solidarity, and shared work with PRIA. From textile workers’ struggles and occupational health to construction workers’ rights and workers’ cooperatives, the blog celebrates his lifelong commitment to workers’ dignity, leadership, and collective action.
In this blog, Dr. Bandyopadhyay reflects on rethinking monitoring and evaluation in development practice. Drawing on his experience with participatory networks, he explores how organisations can move beyond compliance-driven reporting towards listening, collective learning, adaptation, accountability, and cultures that enable honest reflection.
This blog, by Dr. Anshuman Karol, explores why the future of higher education depends on community-engaged research, global collaboration, and knowledge democracy. It highlights how Community-Based Participatory Research enables universities and communities to co-create solutions for today's interconnected social and environmental challenges.