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जमीन और स्थानीय सरकार की जवाबदेही

Any development work needs land. Unfortunately land resources are scare, resulting in conflicts, and most development works are stalled because land cannot be made available on time. How can government ensure that land becomes available, without conflict? Alok Pandey suggests some ways forward, learning from visits to Jharkhand, where PRIA is motivating local elected representatives and community members to ensure planned developmental outcomes. 


विकास के कामों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि देश में विकास के लिये बनायी गयी बहुत सी योजनायें समय से पीछे इस लिये चलती हैं क्योंकि बनायी गयी योजनाओं के लिये जरूरी जमीन समय पर नहीं उपलब्ध होती है। यह भी देखा गया है कि विश्वस्त सूत्रों के आधार पर मिलने वाली सूचना के आधार पर उस क्षेत्र में बिचैलिये बडे सधे तरीकों से जमीनों की खरीद-बिक्री कर लेते हैं। विकास की योजनाओं के घोषित हो जाने के बाद उस क्षेत्र की जमीनों के मालिकाना हक को लेकर होने वाले विवाद और न्यायालय में दाखिल की जाने वाली याचिकाओं पर देरी से आने वाले फैसले भी योजनाओं के देर से पूरा होने के लिये उतने ही जिम्मेदार हैं।

किन्तु हमारे देश में कई उदाहरण भी मिलते हैं जहाँ सरकार के एक विभाग को दी गयी जमीन पर सरकार के ही दूसरे विभाग के द्वारा कब्जा कर लिया गया हो। देश के ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों, में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। एक ऐसा ही उदाहरण झारखण्ड के लातेहार जिले के परसाही ग्राम पंचायत में तब देखने को मिला जब ग्राम पंचायत की शिक्षा के मामले से जुडी स्थायी समिति के सदस्य राज्य सरकार की एक योजना पर चर्चा करने विद्यालय में पहॅुचे।

झारखण्ड सरकार के द्वारा विद्यालयों में डीजिटल लाइब्रेरी बनाने की घोषणा किये जाने के बाद ग्राम पंचायत की शिक्षा समिति इस मसले पर चर्चा करने विद्यालय पहुॅची तो विद्यालय के प्रधानाचार्य से चर्चा के दौरान पता चला कि विद्यालय के पास कितनी जमीन है। इसकी सही जानकारी गाँव में विद्यालय सहित कहीं उपलब्ध नहीं है। प्रधानाचार्य के द्वारा यह भी बताया गया कि विद्यालय के बगल में जिस जमीन पर प्रधान मंत्री सड़क संपर्क योजना के अन्तर्गत सड़क बनायी गयी है वह विद्यालय की जमीन है। सड़क बन जाने से विद्यालय की जमीन दो हिस्से में बँट गयी है और अब इसकी बाउन्ड्री बनाना मुश्किल हो रहा है। बाउन्ड्री न होने से विद्यार्थियों के साथ ही विद्यालय भवन की सुरक्षा दाँव पर लगी है तो दूसरी ओर की जमीन पर दबंगों ने कब्जा कर खेती करना शुरू कर दिया है। इन परिस्थितियों में विद्यालय परिसर में शौचालय, पेयजल और खेल के मैदान की कल्पना करना कठिन है। ऐसे में समिति के सदस्यों ने एक प्रस्ताव पारित कर ग्राम पंचायत के माध्यम से जिले स्तर के शिक्षा विभाग के अधिकारियों को समुचित कार्यवाही करने का आग्रह किया है।

इस पूरे प्रकरण के आधार पर चार महत्वपूर्ण सीख निकलती है।
● सबसे पहली सीख यह है कि सरकार के सभी संस्थानों को आवंटित भूमि के नक्शों को उन संस्थानों के सार्वजनिक स्थल (जैसे नोटिस बोर्ड के पास) के आस-पास चित्रित किये जाने की आवश्यकता है। इससे संस्थान के कार्यकर्ताओं के साथ ही उसके सभी हितभागियों को संस्थान की सीमा के बारे में पूरी जानकारी मिलेगी। इन चित्र की उपलब्धता से भविष्य में उस संस्थान के आस-पास किये जाने वाले विकास के कामों के दौरान संबंधित संस्थान की भूमि का अनजाने में या अवैध तरीके से अधिग्रहण रोका जा सकेगा।

● दूसरी महत्वपूर्ण सीख यह है कि संस्थानों को आवंटित की गयी भूमि का मानचित्र संबंधित संस्थान के साथ ही उस क्षेत्र की संबंधित अभिशासन की इकाई (ग्राम पंचायत या नगर पंचायत) को भी दिया जाय। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि इन संस्थानों में प्रति वर्ष होने वाले आॅडिट के दौरान इन दस्तावेजों का भी आॅडिट कराया जाय। इससे मानचित्रों के न होने या गायब होने की जानकारी मिल सकेगी और इसके लिये व्यक्ति की जिम्मेदारी तय की जा सकेगी। इसके साथ ही गुम हुये दस्तावेज को तत्काल उपलब्ध कराया जा सकेगा। इस पूरी प्रक्रिया के लिये डीजिटल तकनीकों का सहयोग अवश्य लिया जाना चाहिये जो अब देश में असानी से अपलब्ध है।

● तीसरी महत्वपूर्ण सीख यह है कि भूमि संबंधित आँकड़ों को डीजिटाइज करने और इन्हें सभी को उपलब्ध कराने के काम को तेजी से बढ़ाने की जरूरत है।

● चैथी और अंतिम महत्वपूर्ण सीख यह है कि यदि किसी योजना के क्रियान्यन के लिये कहीं ऐसी भूमि की आवश्कता पड़ती है जो पहले से ही किसी अन्य को आवंटित है तो ऐसे में सभी संबंधित संस्थानों के लोगों के साथ उस क्षेत्र के स्थानीय सरकारों को भी विचार-विमर्श के प्रत्येक चरण में शामिल किया जाना चाहिये। इससे भूमि अधिग्रहण के कारण होने वाली देरी को दूर कर वैकल्पिक उपायों को खोजने में मदद मिलेगी।

भारतीय संदर्भ में यह सर्व विदित है कि जमीन का मामला न केवल लोगों के रसूख बल्कि उनकी पहचान और भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में जमीनों को लेकर विवादों का होना तो लाजमी है किन्तु ऐसे भी तरीके हैं जिनसे इन विवादों से बचते हुये विकास को सही दिशा व तेज गति दी जा सकती है।

 

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