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स्कूल जाने का मौलिक अधिकार बना मृग मरीचिका

Right to Education remains a mirage for children living in informal settlements in our cities. Parents living in such settlements can barely eke out a living. How can they ensure their children access the Right to Education? asks Rashmi Ranjan, based in PRIA's field office in Muzaffarpur, Bihar, working on the Engaged Citizens, Responsive City project.


तपती गर्मी में रेत पर चलते हुए प्यासे मृग (हिरण) को पानी से भरा हुआ तालाब दिखता है। यह दृश्य देखकर मृग अपनी चाल और तेज करता है, कि अब उसे जल्द ही प्यास बुझाने के लिए पानी मिल जाएगा, लेकिन नजदीक जाकर वह क्या पाता है? फिर से वही रेत का ढेर वहां तो उसे पानी मिला ही नहीं। दरअसल दूर से जिसे वह तालाब समझ रहा था वह केवल उसकी नज़रों का धोखा था। इसे ही मृग मरीचिका या अंग्रेजी में “मिराज” कहते है। बार-बार इसी धोखे के भरोसा हिरण रेगिस्तान में पानी ढूंढते हुए आगे और तेजी से बढ़ता रहता है और अंत में अपनी जान गंवा देता है।

आपको ये लग रहा होगा कि अब तो बरसात का मौसम आ गया है, पानी भी यहां भरपूर है लेकिन बात हो रही है गर्मी, रेगिस्तान की? आपको बता दें कि आज यह अप्रासांगिक उदहारण गरीब बस्तियों के लिए सटीक बैठ रहा है। वहां के बच्चों की शैक्षणिक दिशा और दशा दर्शाने के लिए यह एक क्रूर उदहारण माना जा सकता है, लेकिन है ये बिल्कुल प्रासांगिक। एक अरब से भी ज्यादा आबादी वाले हमारे देश में केवल एक तिहाई जनसंख्या ही पढ़-लिख सकती है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम दुनियाभर में शीर्ष चौथे ऐसे देश हैं सबसे ज्यादा बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। इन्हीं सब परिस्थितयों को ध्यान में रखकर वर्ष 2002 में संविधान के 84वें संशोधन अधिनियम में शिक्षा को मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल किया गया थाI वर्ष 2010 में शिक्षा के अधिकार को कानूनी ढांचा पहनाया गया, जिसमें 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया।

पर एक बात जो हमें यहां समझ कर चलने की जरुरत है, वह यह है कि नीतियों की उद्घोषणा एक बात है और उसका क्रियान्वयन करना दूसरी बात। बिहार के मुजफ्फरपुर शहर के वार्ड क्रमांक 5 में स्थित अनियमित बस्ती “माल गोदाम” इस परिस्थिति का एक ईमानदार उदाहरण प्रस्तुत करती है, जहां 30 से ज्यादा परिवार कच्चे मकानों में कभी भी विस्थापित किये जा सकने के अर्ज पर निवास करते है। यहां रहने वाले परिवारों में बच्चों की शिक्षा पहले बहुत पहले कई अन्य जिम्मेदारियां भी हैं जैसे परिवार के लिए भोजन उपलब्ध करना, कपड़ों की व्यवस्था, इत्यादि। गरीबी और जरुरी सहूलियत के आभाव में यहां रहने वाले बच्चे न तो प्राइवेट न ही सरकारी स्कूल जाते हैं। हम और आप इसे माता-पिता कि एक गैर जिम्मेदाराना हरकत भी मान सकते हैं, कुछ लोग तो यह भी कह सकते है कि इसीलिए तो ये गरीब हैं। लेकिन मुश्किल से दो वक़्त का भोजन जुटा सकने वाले इन परिवारों में किसी के पास न बच्चों को स्कूल छोड़ने और न ही लाने के लिए समय है। पुरुष काम के लिए बाहर चले जाते हैं तो गृहणी सुबह से पानी के लिए लाइन में खड़ी हो जाती है। सबसे चौंकाने बात तो यह है कि इन घरों के बच्चों को भी रोजी रोटी कमाने के जरिए के तौर पर में देखा जाता है। परिवार के लोग यह सोचते है कि स्कूल जाने की बजाय अगर बच्चे चार पैसे कमा कर लाते है, तो घर की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकती हैI कितनी खतरनाक है न ऐसी स्थिति कि ये बच्चे आज के दौर में भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। गरीबी और अशिक्षा से जुड़ा यह कुचक्र कभी समाप्त नहीं होने वाला है। शिक्षा के आभाव में यहां रहने वालों परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार मुश्किल होगा और आने वाली पीढियां फिर से गरीबी के इसी दलदल में फंसी रह जाएगी। और इस तरह शिक्षा का अधिकार इन बच्चों के लिए मृगमरीचिका ही बना रह जाएगा।

ये बच्चे शायद जानते भी नहीं कि शिक्षा पाना उनके मौलिक अधिकारों में से एक है। उन्हें तो यह भी पता नहीं होगा कि समाज उन्हें शिक्षा से वंचित नहीं रख सकता। अगर रखता है तो यह अपराध की श्रेणी में आएगा। एक प्रगतिशील समाज के नाते हमें यह सोचना चाहिए कि ऐसी कौन सी वजह है कि मिड डे मील, मुफ्त ड्रेस, साईकिल, छात्रवृत्ति जैसी कई नामी-गिरामी योजनायें इन बच्चों को शिक्षा से जोड़ पाने में असफल साबित हो रही है।
नीति निर्धारण के वक़्त इन बच्चों की विशेष परिस्थितियों पर भी गौर किया जाना चाहिए, जिससे इन बच्चों को स्कूल के माध्यम से एक बेहतर भविष्य के साथ जोड़ा जा सके। कहने कि बात नहीं की इन बच्चों के माता पिता को जागरूक होना होगा, न केवल अपने अधिकारों के प्रति बल्कि साथ ही साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी। माता पिता की जागरूकता और सरकार तथा आम जन की संवेदनशीलता इन बच्चों का भविष्य उज्जवल कर सकती है, लेकिन जरुरत है कि इनकी शिक्षा के लिए इनकी मुस्कराहट जैसे निश्छल प्रयास किये जायें।

 

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