नई बस्ती, झाँसी, का भ्रमण अनुभव

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वाल्मिकि समाज के मुखिया रमेश करोसिया कुंठा के साथ कहते है कि, “ हम लोग समाज के सबसे पिछड़े और अछूत लोग है | युवाओ के पास रोजगार की कमी है जब कभी ठेका का काम निकलता है तो त्वरित रोजगार मिल जाता है शेष दिन में बेगारी | कुछ आक्रोशित महिलाये वर्तमान राज्य सरकार को कोसती हुयी कहती है कि यह सरकार सिर्फ मुसलमान के लिए ही काम करती है हम जमादारों से उन्हें क्या मतलब | यह बातचीत तब और कचोटती जब कहते है कि जब रोजगार नही देना था तो सिर पर मैला ढ़ोना क्यों बंद करा दिया, इससे हमारे समाज की महिलाए भी बेरोजगार हो गयी है ” |

एक तरफ समाज की मुख्य धारा से अलग-थलग हांथी खाना जैसी मलिन बस्तियों ( जाति/वर्ण व्यवस्था के अनुसार ) की हालत काफी दयनीय और खस्ताहाल है | बस्ती में विकास का सबसे बड़ा मुद्दा है रोजगार, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, लेकिन महिलाओं की निजता और सम्मान से जुड़ा शौचालय का मुद्दा भी उतना गंभीर है जितना अन्य | स्थिति यह है कि जिनके कंधो पर पूरे शहर की सफाई का जिम्मा हो और उनके घर में शौचालय तक नही है | तो वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री का अति महत्वपूर्ण फ्लेगशिप कार्यक्रम है स्वच्छ भारत अभियान, जिसको लेकर विश्व पटल पर भी तारीफ़ हो रही है | इस योजना का मूल अगर देखा जाये तो यह निकलता है कि सब के घर में शौचालय हो और देश पर खुले में शौच का कलंक धुल जाए |

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असल में झाँसी में बहुत से ऐसे क्षेत्र है जहाँ पर नगर निगम की नजर तक नहीं गई है, जैसे कि नई बस्ती का हांथी खाना क्षेत्र, जिसमें वाल्मीकि समाज के लोग पूर्वजों के समय से रानी लक्ष्मीबाई के काल से बसेरा बनाये हुए है, वाल्मीकियो के अनुसार यह इलाका उनके पूर्वजों को रहने के लिए दिया गया था, जहां उनके पूर्वज महल के हाथी घोड़ो की साफ़ सफाई किया करते थे, तब से आज तक उनके वशंज के रूप में समुदाय के लोग निवास कर रहे है |

इतिहास के पन्नो में हांथी खाना का महत्व रहा है, और वर्तमान में यह पुरातात्विक विभाग द्वारा सरंक्षित क्षेत्र भी है, यहां पर वाल्मीकि समाज और पुरातात्विक विभाग के बीच जमीन के मालिकाना हक़ को लेकर मामला न्यायालय में विचारधीन है, जिसकी वजह से यहाँ पर विकास कार्य नही हो पा रहे है | झाँसी में ऐसे बहुत से क्षेत्र है जिनका अपना इतिहास है, लेकिन यह भी देखने वाली बात है कि जिम्मेदार विभाग ऐतिहासिक धरोहरों को कितना सहेजते है ? कानूनी लड़ाई के बीच हांथी खाना के लोग आज भी खुले में शौच को जाने को मजबूर है | इस रस्साकशी के बीच नगर निगम द्वारा शौचालय के लिए दूसरा विकल्प भी नही सोचा गया है और साथ में अच्छा बहाना है कि नगर निगम तो शौचालय बनबाना चाहता है लेकिन स्थाई निवास का मामला विचाराधीन है जिस वजह से कार्यवाही आगे नही बढाई जा सकती है, इस स्थिति के चलते बस्ती में शौचालय के आवेदन तक कराना मुनासिब नही समझा गया और बस्ती में मध्य सड़क का कार्य बीच में अधूरा छोड़ दिया गया|

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बात करते है असल मुद्दे की, क्या कभी नगर निगम ने झाँसी में इस तरह का सर्वे किया जिससे निकलकर आया हो वास्तविक लाभार्थी कितने है, क्या ऐसे क्षेत्र चिन्हित किये है जहाँ कोई विवाद है और उस वजह से अभियान के लक्ष्य पाने में कठिनाई हो और वहां क्या रणनीति अपनाई जा सकती है, कच्ची बस्तियों में रहने वाले लोग कहाँ शौच के लिए कहाँ जायेगे | अनुभव यह कहता है कि यह अभियान न तो देश के लिए नया है और न ही उन कार्यदायी संस्थाओ के लिए | ऐसी जड़वत मुद्दे / समस्याओं का हल तलाशने की कोशिश नही की जाती है और न ही इनसे सबक अब तक लिया जाता है | ऐसे में कैसे भारत खुले में शौच मुक्त देश हो सकता है यह बड़ा प्रश्न है |

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