सूखा और पेयजल संकट

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बुंदेलखंड में पानी का संकट लगातार भयावह होता जा रहा है | जितना बड़ा संकट सिचाई का है उतना ही पेयजल का है | गाँवों में तस्वीर बिलकुल बदली हुयी है मानो लगता है कि पतझड़ के मौसम में सूखा अभी से पड़ गया है, पर्याप्त पानी के अभाव में खेतो में बुबाई  नही की जा सकी, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गर्मियों में क्या हालात पैदा हो सकते है |

वैज्ञानिक दृष्टि से इसे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कहा जा सकता है, लेकिन इस प्रभाव का सबसे अधिक प्रभाव समाज के अति पिछड़े वर्ग के लिए अभिशाप बन कर उभरा है | पानी के संकट से उपजे सामाजिक भेदभाव को आसानी से दूर से पहचाना जा सकता है | पेयजल की समस्या ने गरीब मजदूर वर्ग की दैनिक दिनचर्या को बदल कर रख दिया है |

स्मार्ट सिटी में अपनी जगह बनाने की कोशिश में पानी का मुद्दा कंही घुल गया है, शहरी अमीर के लिए बिजली, चकाचक सड़क, एक मुद्दा हो सकती है किन्तु एक ग्रामीण क्षेत्र एवं शहरी पिछड़े क्षेत्र में पानी से ज्यादा अहम् मुद्दा कुछ नही है | ग्राम करगुवा में पिछड़े क्षेत्र कैमासन पुरम में लोगो से बातचीत से पता चला कि पेयजल के लिए उन्हें एक से दो किलो मीटर तक जाना होता है, यह और भी अधिक दुश्वार होता है पहाड़ी पर बने घर तक ले जाने में | बातचीत करने पर पता चलता है कि इस क्षेत्र के लिए आज से दस वर्ष पूर्व एक पानी की टंकी प्रस्तावित हुयी थी, जो योजना आज तक परवान नही चढ़ सकी | ऐसा नहीं है कि बस्ती में सरकारी हैंड पम्प नही है, लेकिन उन पर जंजीर और ताले जड़े हुए है | यदि पानी भरने की कोशिश भी हुयी तो दुसरी तरफ से गालियों की बौछार होती है | इसलिए सम्मान बचाने के लिए थोड़ी दूरी भी सह ली जाती है | ऐसा नहीं है कि नगर निगम के प्रशासन द्वारा व्यवस्था न की जाती हो, लेकिन शहर की सीमा से निकलते ही पानी के टैंकर ( वैल्क्पिक संसाधन) एक बार फिर सामन्ती लोगो के हाथ में होता है, कभी- कभी टैंकर चालक की सेवा कर देने से मार्ग परिवर्तित हो जाता है |

 

बिजली के तार की जगह पानी की पाइप लाइन

आगे चलने पर ग्राम कोछाभावर में भी कुछ पिछले गाँव के तरह हालात मिले | यह वही कोछाभावर है जिसके मटके दूर दूर तक सिर्फ गाँव के नाम से बिकते है, कुछ वर्ष पूर्व चीनी मिटटी से निर्मित बर्तनों को बढावा देने के लिए लोगो को उद्योग स्थापित करने के लिए अनुदान दिया, लेकिन जो सफल न हो सका, ख़ैर ग्राम भ्रमण के दौरान देखने को मिला कि गाँव के कुएं अभी से सुख गए है, जल स्तर काफी नीचे चला गया है, जो कुछ हैण्ड पम्प है वो खारा पानी उगलते है | यह संकट कुछ लोगो के लिए व्यवसाय के रूप में उभरा है |  हमने पानी को किराये पर देखने के उदाहरण देखे व् सुने होंगे, लेकिन कोछा भांवर में सरकारी वयवस्था को ठेंगा दिखाते हुए निजी/ प्राइवेट पानी की पाइप लाइन बिछाई गयी है वह भी हवा में,  जिसका प्रति माह तीन से चार सौ रूपये वसूले जाते है दबंगी के साथ, यंहा उधारी की गुंजाईश बिल्कुल नही है |  यह बड़ा आश्चर्य का विषय है कि किस तरह से प्राकृतिक संसाधन पर कुछ लोगो का दबदबा और कब्ज़ा है और जरुरतमंद उफ़ भी नहीं कर सकता है |

गावों में भ्रमण करने से महसूस हुआ कि  सामाजिक भेदभाव का जिन्न अभी भी जिन्दा है और देखने को मिलता है, “सम्पन्न और शक्तिशाली को अवसर पहले है | यह एक समता मूलक समाज पर प्रश्न है”

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