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ममतामयी, हिम्मतवाली, लाजवंती (महिला)

Nivedita Singh, Senior Program Officer, asks: why are descriptions of women, particularly by men, always tied to their social and cultural roles? Can we not separate women from their gendered roles? She also raises the important issue of how men and women in public office describe women. It is necessary to pay attention to the words we use to describe the role of women.


ममतामयी, हिम्मतवाली, लाजवंती (महिला)I क्या यही है एक महिला की परिभाषा? जी हाँ, राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमति सुमन शर्मा जी ने महिला के महत्त्व को मजबूती से बताने के लिए ही शायद इन शब्दों को चुना, उन्होंने महिला का महिमामंडन करते हुए संस्कृति से बाँध दिया I 7 सितंबर 2016 जयपुर में महारानी कॉलेज के सभागार में “महिला हिंसा मुक्त समाज” पर एक राज्यस्तरीय परिचर्चा के दौरान सुमन जी ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने वक्तव्य में महिला हिंसा मुक्त समाज की परिकल्पना करते हुए ऐसा कुछ कह डाला I ऐसा सुन कर मैं स्तब्ध रह गई, जैसे किसी ने हमारी आशाओं को कितना पीछे धकेल दिया हो I इतना ही नहीं इसके बाद दूसरा झटका तब लगा जब कि ‘राजस्थान लीगल सर्विसेज अथॉरिटी’ के अध्यक्ष, जोकि एक रिटायर जज भी रह चुके हैं ने भी कुछ ऐसा कहा, जो इस मुहीम से जुड़े संवैधानिक पद पर आसीन लोगो की सोच पर प्रश्न खड़ा करता है I महारानी कॉलेज की ही एक छात्रा ने उनसे ‘रिपोर्ट लिखवाने जाती महिलाओं से जिस तरह से प्रश्न किये जाते हैं, उसपे सवाल किया” और उनका जबाव था “महिलाओं से प्रश्न उनके लज्जा एवं शर्म को ध्यान में रखते हुए किया जाता है, इसलिए आप ज्यादा परेशान न हों” I

आज जहाँ हम एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों की वजह से महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं संवैधानिक पद पर आसीन जिम्मेदार लोगो के शब्दों का प्रयोग इस मुहीम को कमजोर बनाता जा रहा है I

महिला का मतलब हमारे लिए क्या है ? क्यूँ हम महिलाओं को हमेशा एक प्रश्न की तरह ही देखना चाहते हैं और सहानुभूति दिखाते रहना चाहते हैं ? महिला सबसे पहले एक इन्सान है, जीवन जीने के लिए जिन सारी चीजों की आवश्यकता पुरूषों को हैं, महिलाओं को भी उतनी ही हैं I फिर क्यूँ कभी परिवार के नाम पर, तो कभी धर्म के नाम पर, तो कभी संस्कृति के नाम हमेशा एक महिला को कमजोर करने का प्रयास होता रहता है I ऐसे धर्म और संस्कृति का क्या फायदा जो समाज के शांतिपूर्ण एवं विकाश की पैरो की जंजीर बनी हुई है I कब तक संस्कृति के नाम पर महिलाओं के अस्तित्व के साथ खिलवार होता रहेगा?

आज जहाँ एक ओर दुनिया तरह तरह के टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया, ट्विटर और फेसबुक के प्रयोग में आगे बढ़ती जा रही है वंहा आज भी सदियों पुराणी प्रथाओं, जिसने महिला की स्थिति को बद से बदतर किया हुआ है, उसमे भी सिर्फ हिंसा के तरीके का आधुनिकीकरण होता दिख रहा है पर लोगों की सोच में महिला का अपना एक अस्तित्व होता है कब आएगा ? जहाँ बिना महिला के इस धरती पर मानव जीवन संभव नहीं है वहां हम आज भी महिला शब्द के अर्थ को सपष्ट करने में लगे हैं, ये देख कर ऐसा नहीं लगता की हम और कुछ नहीं, सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं !!!



Photo credit: Natalie Maynor, https://www.flickr.com/photos/nataliemaynor, licensed under Creative Commons 2.0 Generic (https://creativecommons.org/licenses/by/2.0/)

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