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क्या चल रहा है?

 

इन दिनों टीवी पैर एक advertisement आता है जो यह सवाल करता है . जवाब में, फ़ोग मिलाता है. फ़ोग जब पड़ता है तो दिखना कम हो जाता है. गर्मी में फ़ोग पड़ने  का मतलब कम है.

पर आज कल देश-विदेश में कोहरा छाने जैसी स्तिथि बनी है. स्पष्ट नज़र का अभाव चल रहा है.

अब Aadhar का ही किस्सा ले लें. जब Aadhar शुरू हुआ तो लोगों ने कहा की यह बेमानी है, और तमाम दुसरे पहचान पत्रों से बेहतर नहीं है. और इससे सभी इंसानों की वव्याक्तिगत जानकारी सरकार के पास आ जाएगी.

इस हफ्ते देश के सौ करोड़ नागरिको के पास aadhar कार्ड आ गया है. यह देश की 80% आबादी है. इस कार्ड से नागरिको को सरकारी सुविधाओं का लाभ मिल रहा है. जिनके पास कोई और पहचान नहीं थी, उन्हें अब एक identity मिल गयी है.

Identity का प्रश्न महिलायों के लिए नितांत जरूरी है. aadhar कार्ड के पहले अधिकांश ग्रामीण महिलायों के पास अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं थी. उन्हें अपने मर्दों पर आश्रित रहना पड़ता था. aadhar के biometric स्वरुप ने फर्जी पहचान और छुपी identity  की समस्या को कुछ हद तक हल करना शुरू कर दिया है.

रहा privacy का मसला तो नया विधेयक पार्लियामेंट में है और उसको तुरंत पास किया जाना चाहिए.

aadhar कार्ड तभी और मज़बूत आधार दे पायेगा जब इसको mandatory किया जाये. और उसके बाद सभी अन्य पहचान पत्रों को बंद कर दिया जाये. हर बचे के लिए जन्म से aadhar जैसे कार्ड की व्यवस्था हो. इससे  आबादी की पहचान और विदेशी घुसपैठ के मसले का भी कुछ ठोस समाधान मिल सकता है. दुनिया के अधिकांश देशों में अनिवार्य पहचान पत्र सभी नागरिको को मिलते है.

हमें अपने सभी कार्यक्रमों में यह ध्यान देना चाहिए की पहचान और identity सहभागिता का आधार बनती है. सभी इंसान अपनी पहचान को सम्मान देते हैं, और सहभागिता को मजबूती प्रदान करना पहचान  को identity बनाना है.

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